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पाखी एक झांके है नीचे
कल कल जल बहता है उस पे
सूर्य किरण से आँखें मीचे
देखे दूर अनंत वो नभ में
कैसे पक्षी उड़ते जाते
पर अपने इन छोटे पर से
अभी नहीं उड़ान भर पाते
पर मन में विचार उमड़ते
चंचल से बहते पानी से
गर उड़ पाये वो भी नभ में
भले ही आनाकानी से
फैले विस्तृत महाकाश में
वो भी कभी उड़ान भरे
शीतल जल पर शीतल वायु
वो भी कभी महसूस करे
ज्यों ज्यों पाखी हुई सयानी
त्यों त्यों उसके पंख बढ़े
रेशम के रेशे से कोमल
इंद्रधनुषी रंग भरे
जब उसने भरी उड़ान वो पहली
गयी वो नीचे सीधी जाकर
छोटे से पेड़ के सर पे
अटक गयी टहनी टकराकर
कोशिश की लाख जतन कर
गिर गिर उठ न पायी वह
देखा पंख जो हुए रुपहरे
कटे फटे से पायी वह
दिल की धड़कन बढ़ी कुछ ऐसे
जैसे कलेजा फाड़ दिया
स्तब्ध भाव से बैठी वो फिर
किस्मत का क्या खेल नया
उठी गिरी फिर उठी गिरी वह
न जाने किस डर से डर
लाख कोशिशों के बाद भी
न उड़ पायी आहें भर भर
थक के चूर जब हुई हार कर
गयी उस जल धारा के पास
शीतल जल से प्यास बुझा कर
जगी उसमे एक नयी सी आस
धीरे धीरे वो जल में उतरी
थोड़ा थोड़ा सकुचा कर के
शीतल जल का स्पर्श हुआ जब
पाखी तनु स्पंदन भर के
नन्हें पैरों से जब उसने
पानी को छलकाया था
कुछ आगे की तरफ बढ़ी वो
दिल उसका भरमाया था
नवल चेतना से आनंदित
चले जोश में पांव चला चल
पानी पे वो तैरे ऐसे
झरने से गिरता जल चंचल
समय जो बीता हुई पारखी
जल विचरण अब करे वो ऐसे
ऊपर उस अनंत से नभ में
पक्षी विचरण करें हैं जैसे
इच्छाशक्ति और हौसला
था पाखी मन में असीमित
खोकर अपनी मुख्य कुशलता
अंश मात्र भी हुई न विचलित
हम सबका भी कोई सपना
कटा फटा सा रहता होगा
लेकिन मन में सोच का दरिया
अभी भी कहीं बहता होगा
बहने दो उसे कलरव करके
रुकने कभी न पाये वो
ज्यों ही सोच का दरिया रोको
काई सी जम जाये जो
सोच का दरिया बढ़ते बढ़ते
जैसे ही छलकायेगा
नए सपनों की गगरी लेकर
गगरी भर भर जायेगा
