Pages

Tuesday, 22 December 2015

पाखी

Source
दूर कहीं सघन वन तरु पे
पाखी एक झांके है नीचे
कल कल जल बहता है उस पे
सूर्य किरण से आँखें मीचे
देखे दूर अनंत वो नभ में
कैसे पक्षी उड़ते जाते 
पर अपने इन छोटे पर से
अभी नहीं उड़ान भर पाते
पर मन में विचार उमड़ते
चंचल से बहते पानी से
गर उड़ पाये वो भी नभ में
भले ही आनाकानी से
फैले विस्तृत महाकाश में
वो भी कभी उड़ान भरे
शीतल जल पर शीतल वायु
वो भी कभी महसूस करे

ज्यों ज्यों पाखी हुई सयानी
त्यों त्यों उसके पंख बढ़े
रेशम के रेशे से कोमल
इंद्रधनुषी रंग भरे
जब उसने भरी उड़ान वो पहली
गयी वो नीचे सीधी जाकर
छोटे से पेड़ के सर पे
अटक गयी टहनी टकराकर
कोशिश की लाख जतन कर
गिर गिर उठ न पायी वह
देखा पंख जो हुए रुपहरे
कटे फटे से पायी वह
दिल की धड़कन बढ़ी कुछ ऐसे
जैसे कलेजा फाड़ दिया
स्तब्ध भाव से बैठी वो फिर
किस्मत का क्या खेल नया
उठी गिरी फिर उठी गिरी वह
न जाने किस डर से डर
लाख कोशिशों के बाद भी
न उड़ पायी आहें भर भर

थक के चूर जब हुई हार कर
गयी उस जल धारा के पास
शीतल जल से प्यास बुझा कर
जगी उसमे एक नयी सी आस
धीरे धीरे वो जल में उतरी
थोड़ा थोड़ा सकुचा कर के
शीतल जल का स्पर्श हुआ जब
पाखी तनु स्पंदन भर के
नन्हें पैरों से जब उसने
पानी को छलकाया था
कुछ आगे की तरफ बढ़ी वो
दिल उसका भरमाया था
नवल चेतना से आनंदित
चले जोश में पांव चला चल
पानी पे वो तैरे ऐसे
झरने से गिरता जल चंचल

समय जो बीता हुई पारखी
जल विचरण अब करे वो ऐसे
ऊपर उस अनंत से नभ में
पक्षी विचरण करें हैं जैसे
इच्छाशक्ति और हौसला
था पाखी मन में असीमित
खोकर अपनी मुख्य कुशलता
अंश मात्र भी हुई न विचलित

हम सबका भी कोई सपना
कटा फटा सा रहता होगा
लेकिन मन में सोच का दरिया
अभी भी कहीं बहता होगा
बहने दो उसे कलरव करके
रुकने कभी न पाये वो
ज्यों ही सोच का दरिया रोको
काई सी जम जाये जो
सोच का दरिया बढ़ते बढ़ते
जैसे ही छलकायेगा
नए सपनों की गगरी लेकर
गगरी भर भर जायेगा