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Thursday, 16 March 2017

रास्तों की दास्ताँ


लम्बे सुनसान रास्तों पर जब घूमा मैं दर-ब-दर

जाना मैंने कि मिल जाते हैं कुछ जाने अनजाने हमसफ़र 

जो मंज़िलों की दूरी को कम कर देते हैं 

जो ख़ामोश कारवां में ज़िंदगी भर देते हैं 

तब रास्ते भी घर जैसे लगने लगते हैं

तब अनजाने भी हमसफ़र जैसे लगने लगते हैं

रास्तों की दूरी और मंज़िल के दरम्यां

ज़िंदगी के सारे किस्से हो जाते हैं बयाँ

हँसी मज़ाक में सारा सफ़र यूँ ही कट जाता है

और सभी का रंज-ओ-ग़म भी आपस में बंट जाता है

सिलसिला ये सुहाने सफ़र का, मंज़िल से हम भागते रहते हैं

ना जाने क्यूँ ये रास्ते मंज़िलों से बेहतर लगते हैं।

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